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Wednesday, 4 May 2016

मुबस्सिर के जज़्बे को सलाम, उड़ान के लिये चाहिये हौसला साबित कर दिखाया


आज देश भर में लाखो विकलांग अपने आपको कमज़ोर और बेबस समझ कर लाचारगी की ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं । शारीरिक तोर पर सही सलामत ना होने पर अपने आप में अहसास ऐ कमतरी का शिकार हैं लेकिन कुछ दिनों पहले मेरी मुलाक़ात देवबन्द में तय्यब ट्रस्ट के तय्यब हॉस्पिटल में मुबस्सिर नामी एक ऐसे पुर उम्मीद और  ज़िंदादिल नोजवान से हुई जो 80 फीसद से ज़यदा विकलांग था, सही ढंग से बोलना और खुद अपने सहारे से चलना उसके लिये मुश्किल था.



लेकिन मेरी हैरत की इंतेहा ना रही जब मैंने उसको कंप्यूटर पर उँगलियाँ चलाते और डेटा फीड करते हुए देखा,मैंने रूक कर उससे बात चीत की लेकिन उसकी बातें मुझे समझ में नही आई फिर इशारों से पूछा क्या क्या जानते हो कंप्यूटर में ? उसने कहा सारा काम करलेता हूँ  Microsoft Word /Excel/PowerPoint/Photoshop/coral draw/अदि सब कुछ जानता हूँ,मुझे बड़ा अच्छा लगा---मुबस्सिर ने अपनी कमज़ोरी को कमज़ोरी नही बनाया बल्कि इससे लड़कर समाज में एक नई और इज़्ज़तदार ज़िन्दगी गुज़ारने के लिये अपने हुनर का इस्तेमाल किया।


आज सड़क के किनारे,बस स्टॉप,रेलवे स्टेशन,पार्क अदि में सेकड़ो अपाहिज भीख माँगते नज़र आते हैं और हम उनकी लाचारगी पर तरस खाकर भीख में दो चार दस रूपये उनको दे देते हैं ।सच पूछो तो हम उन पर अहसान नही बल्कि उनको भिखारी बना रहे हैं, अगर हम अपने समाज के मोहताज़ विकलांग बच्चों या बड़ो को किसी हूनर से जोड़ दें तो ये समाज की सबसे बड़ी सेवा और सबसे बड़ा पूण्य का कार्य होगा ।

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