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Wednesday, 25 May 2016

मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते?


सामने उसके कभी उसकी सताइश नहीं की।
दिल ने चाहा भी मगर होंटों ने जुंबिश नहीं की॥

जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था चले जाता है,
उसका क्या रंज के जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की॥

ये भी क्या कम है के दोनों का भरम क़ायम है,
उसने बख़्शिश नहीं की हमने गुज़ारिश नहीं की॥

हम के दुख ओढ के ख़िल्वत में पड़े रहते हैं,
हमने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की॥

ऐ मेरे अब्रे करम देख ये वीरानए-जाँ,
क्या किसी दश्त पे तूने कभी बारिश नहीं की॥

वो हमें भूल गया हो तो अजब क्या है फ़राज़,
हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं की॥

अहमद फ़राज
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 वो जो आ जाते थे आँखों में सितारे लेकर।
जाने किस देस गए ख़्वाब हमारे लेकर।

छाओं में बैठने वाले ही तो सबसे पहले,
पेड़ गिरता है तो आ जाते हैं आरे लेकर।

वो जो आसूदा-ए-साहिल हैं इन्हें क्या मालूम,
अब के मौज आई तो पलटेगी किनारे लेकर।

ऐसा लगता है के हर मौसम-ए-हिज्राँ में बहार,
होंठ रख देती है शाख़ों पे तुम्हारे लेकर।

शहर वालों को कहाँ याद है वो ख़्वाब फ़रोश,
फिरता रहता था जो गलियों में गुब्बारे लेकर ।

नक़्द-ए-जान सर्फ़ हुआ क़ुल्फ़त-ए-हस्ती में 'फ़राज़' ,
अब जो ज़िन्दा हैं तो कुछ सांस उधारे लेकर।


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एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते?

जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते?
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते?

मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते?

लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो
तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यों नहीं देते?

अब शिद्दते ग़म से मेरा दम घुटने लगा है
तुम रेशमी ज़ुल्फों की हवा क्यों नहीं देते

रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा
हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते ?

जब मेरी वफाओं पे यकीं तुमको नहीं है
तो मुझको निगाहों से गिरा क्यों नहीं देते?

साया हूँ तो साथ ना रखने का सबब क्या 'फ़राज़',
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते?

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