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Thursday, 12 May 2016

बारिश हुई तो गांव मे सैलाब आ गया


अपने काबू से निकल जाने को जी चाहता है ,
गिरते गिरते भी सभँल जाने को जी चाहता है !
मुझमें कुछ है जो बदलने नही देता मुझको ,
एक मुद्दत से बदल जाने को जी चाहता है !
दूर है मुझसे अभी नक्से क़दम भी जिसके ,
उसके क़दमों में मचल जाने को जी चाहता है !

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अजीब तरह से लोगों ने इंतक़ाम लिया ,
मेरे खिलाफ मेरे बाजुओं से काम लिया !
मुझे भी फ़ख़्र है खुद पर कि मैंने बरसों तक ,
न तुझको दिल से भुलाया न तेरा नाम लिया ,


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अगर हम पर कोई एहसान होगा ,
तो सारे मुल्क मे ऐलान होगा !
तुम्हें जाने वफ़ा कहता था कोई ,
कहाँ तुमको अब इतना ध्यान होगा !
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जज्बात को अलफ़ाज़ का पैकर नही मिलता ,
हैरत है कि दरिया को समंदर नही मिलता !
मैं ही तो नही सर्द मुलाकात का मुजरिम ,
पहले की तरह तू भी तो हसँकर नही मिलता !

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डूबा जो आफ़ताब तो महताब आ गया ,
फिर दिल जलों के हाथ में तेजाब आ गया !
ख्वाबों की आरज़ू में मुझे नींद आई थी ,
नींदें उजाड़ने को तेरा खवाब आ गया !
बादल रहा खिलाफ तो खेती झुलस गई ,
बारिश हुई तो गाँव में सैलाब आ गया !

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