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Wednesday, 11 May 2016

माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ.......



एक खूबसूरत नज़्म के ज़रिये मुल्क़ की तमाम अवाम से क्राइम अपडेट की अपील । कि अल्लाह की रहमत,घर की लक्ष्मी यानी अपनी बेटियो और बेटों मे भेदभाव न करे बेटियों को कोख़ के अन्दर न मारे उन्हें अपनी दुनिया मे खुले दिल से आने दे। जो तालीम हम बेटों को देते है जो सपने हम बेटों के लिये सजाते है वो तालीम अपनी बच्चियों को भी दे वो सपने बेटियो के मुस्तक़बिल के लिए भी सजाए फिर देखे आपकी बेतिया हिन्दुस्तान की बेटिया बनकर देश और आपका नाम किस तरह रोशन करती है।पेश है एक खूबसूरत नज़्म             


                -- नज़्म--

मे तुझको एक बात बताना चाहती हूँ।
माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।।

चाँद छूँगी और तारों की सेर करूंगी
मुश्किल हो कितनी भी डटकर खड़ी रहूंगी।
मे क्या हूँ सब को दिखलाना चाहती हूँ।
माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।।

क़ैद करो न चार दीवारों मे मुझको
खोल मेरे पर देख ऐ मेरी माँ मुझको।
मे पापा का हाथ बटाना चाहती हूँ।

माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।।

मे भारत की बेटी हूँ कुछ कर दिखलाना है मुझको।
अपनी धरती माँ का भी कुछ कर्ज चुकाना है मुझको।
मे दुश्मन को मार भगाना चाहती हूँ।

माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।।

पापा को समझाओ मुझको भी किताब दिलाओ।
मे तुलसी हूँ आँगन की सब लोगो को समझाओ।
मे गांव की शान बढ़ाना चाहती हूँ
माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।

माँ सुन मे भी पढ़ने जाना चाहती हूँ।।...
               ( मोहम्मद वसीम अब्बासी)

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