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Wednesday, 11 May 2016

महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी


न सब बेख़बर हैं, न हुशियार सब।
ग़रज़ के मुताबिक़ हैं किरदार सब।

ख़बर है कोई चारागर आएगा,
सलीके से बैठे हैं बीमार सब।

बड़ी धूम है उसके इंसाफ़ की,
बड़े मुतमइन है गुनहगार सब।

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लुट गए ख्वाब सुहाने मेरे,
काम आये न बहाने मेरे।

दर्दे सर मे अजीब लज़्ज़त थी,
कोई बेठा था सरहाने मेरे।

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                       अक़ील नौमानी।
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किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे।
गुज़र गई जरसे-गुल उदास कर के मुझे।
मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्तां में,
जगा के छोड़ गए क़ाफ़िले सहर के मुझे।

                                  (नासिर काज़मी)


होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी।
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी कभी।
तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था,
गुज़री है मुझ पे यह भी क़यामत कभी कभी।
कुछ अपना होश था न, तुम्हारा ख़्याल था,
यूँ भी गुज़र गई शबे फ़ुरक़त कभी कभी।
ऐ दोस्त! हमने तर्के मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

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                                नासिर काज़मी
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इस क़दर उसको सदा दी मैंने।
अपनी आवाज़ गँवा दी मैंने।

चाँद इतराया बहुत फिरता था,
तेरी तस्वीर दिखा दी मैंने।

ख़्वाब के फूलों ने आँखें खोलीं,
नींद की शाख़ हिला दी मैंने।

सुबह तक जलती रहे तो किस्मत,
आख़िरी शम्अ जला दी मैंने।

विकास शर्मा राज़

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