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Monday, 23 May 2016

मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब,


उसके पहलू से लग के चलते हैं।
हम कहीं टालने से टलते हैं।

मै उसी तरह तो बहलता हूँ,
और सब जिस तरह बहलते हैं।

वो है जान अब हर एक महफ़िल की,
हम भी अब घर से कम निकलते हैं।

क्या तकल्लुफ्फ़ करें ये कहने में,
जो भी खुश है हम उससे जलते हैं।

जॉन एलिया

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई।
क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई।

साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं,
रिश्तों में ढूँढता है तो ढूँढा करे कोई।

तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं,
ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई।

दीवार जानता था जिसे मैं, वो धूल थी,
अब मुझ को एतिमाद की दावत न दे कोई।

मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब,
मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई।

ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है,
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई।

हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ,
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई।

इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र,
काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई।

जॉन एलिया

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