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Friday, 9 September 2016

1947 तक 33 फीसदी नौकरियों में थी मुस्लिमों की हिस्सेदारी, अब सिर्फ 2.5 फीसद


नई दिल्ली। देश के मुसलमानों की स्थिति सबसे बदतर है। शिक्षा, सामाजिक, नौकरी, आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर मुसलमान पसमांदगी का शिकार है। लेकिन मुसलमानों की यह स्थिति शुरु से नहीं रही है। आजादी के वक्त तक मुसलमानों की स्थिति काफी अच्छी थी, लेकिन वह धीरे-धीरे पसमांदगी का शिकार होते चले गए।

1947 में 33 फीसदी नौकरियों में थी हिस्सेदारी

मुसलमानों की स्थिति पर नजर डाले तो आजादी के वक्त तक उनकी स्थिति सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी थी। देश की आजादी के वक्त तक आईएएस, पीसीएस और अन्य अधिकारी रैंक की नौकरियों में मुसलमानों की भागेदारी 33 फीसदी थी, लेकिन मौजूदा वक्त में 2.5 से 3 फीसदी रह गई है।

क्या कहती है सच्चर कमेटी की रिपोर्ट?

2005 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने जस्टिस राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था। जिसने भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक और सरकारी प्रतिनिधित्व पर एक रिपोर्ट संसद में पेश की थी। 2006 में पेश हुई इस रिपोर्ट के अनुसार ब्यूरोक्रेसी में मुसलमानों का प्रतिशत मात्र 2.5 फीसदी था जबकि उस समय भारत की आबादी में उनका हिस्सा 14 फीसदी से भी ज्यादा था।

सभी सरकारी सेवाओं में मुसलमानों की भागेदारी

88 लाख सरकारी कर्मचारियों के आंकड़ों में महज 4.4 लाख अर्थात् 5 फीसदी ही मुसलमान हैं। 14 लाख सार्वजनिक उपक्रम के कर्मचारियों में केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में 3.3 फीसदी और राज्य स्तरीय सार्वजनिक उपक्रमों में 10.8 प्रतिशत मुसलमान हैं। रेलवे में कुल कर्मचारियों में 4.5 प्रतिशत, बैंक में 2.2 प्रतिशत, सुरक्षा एजेंसियों में 3.2 प्रतिशत, डाक सेवा में 5.0 प्रतिशत, विश्वविद्यालयों में 4.7 प्रतिशत मुसलमान कर्मचारियों की भागीदारी है।

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