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Monday, 5 September 2016

“मेवात की ‘निर्भया’ पर खामोशी क्यों? क्यों नहीं मिल रहा है इंसाफ़?, क्योंकि वे मुस्लिम हैं?”



  “ऐसी बेहिसी और खामोशी तो शायद हमारे मानवता को भी ठेस पहुंचाने वाली है, एैसी हैवानियत जिस से पूरे देश को उबल जाना चाहिए था, आप सोच सकते हैं उस वक्त मेवात की निर्भया के साथ क्या हुआ होगा जब एक लड़की ने भागने की कोशिश की तो उसके छ माह के बच्चे की गर्दन पर खंजर रख दिया गया और फिर सामूहिक बलात्कार किया गया।”

जब दिल्ली में निर्भया रेप केस हुआ था तो मुझे याद है कि करोड़ों की तादाद में हिंदुओं के साथ मुसलमानों ने मिल कर आवाज़ उठायी थी, धरने दिया था, उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए संघर्ष किया था।

रातों रातों जग कर,भूखे रह कर इंसाफ़ की जंग लड़ी थी, और यूं निर्भया देश की बेटी कहलाई, उसे इंसाफ़ मिला। लेकिन हरियाणा के तावड़ू कस्बे के गांव डिंगरहेड़ी में 24 तारीख़ को जो हैवानियत हुई। जिस तरह से मामा-मामी के सामने भांजियों का सामूहिक बलात्कार किया गया फिर मामी की छाती को काट दिया गया और दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया।

यकीनी तौर पर ये घटना निर्भया केस से कहीं ज्यादा झकझोरने वाली थी, सीने में एक इंसान का दिल रखने वाले को आहत ही नही, झंझोड़ देने वाली थी।

मेवात की निर्भया की यह खूनी घटना से देश की संवेदनशीलता का पतन हुआ, मुझे उम्मीद थी कि इस के खिलाफ़ भी आवाज़ उठाई जाएगी, चैनलों पर इस निर्मम दुष्कर्म व हत्या को दिखाया जाएगा, इस पर कार्रवाई की मांग की जाएगी।

कैंडल मार्च, धरना प्रदर्शन, दिल्ली जाम, नेताओं के दौरे, जैसी औपचारिताओं को पूरा करके इंसान होने का सुबूत दिया जाएगा, फास्ट ट्रेक कोर्ट में दोषियों को पेश किया जाएगा, लेकिन ये क्या?

ऐसी बेहिसी और खामोशी तो शायद हमारे मानवता को भी ठेस पहुंचाने वाली है, एैसी हैवानियत जिस से पूरे देश को उबल जाना चाहिए था, आप सोच सकते हैं उस वक्त मेवात की निर्भया के साथ क्या हुआ होगा जब एक लड़की ने भागने की कोशिश की तो उसके छ माह के बच्चे की गर्दन पर खंजर रख दिया गया और फिर सामूहिक बलात्कार किया गया।

लेकिन सब खामोश हैं, चुप्पी का ताला लगा हुआ है, मीडिया चैनल जो बर्बरता, और क्रूरता के लिए इराक़ व सीरिया में हो रहे उत्पीड़न को घंटों घंटों अपने चैनलों पर जगह देते हैं, क्या इस घटना से बढ़ कर कोई क्रूरता, उत्पीड़न, और हैवानियत भी हो सकती है?

क्या इस घटना से उन का दिल नहीं पसीजा?

राष्ट्रीय राजधानी से चंद घंटों की दूरी पर खेले गये इस हैवानी खेल के शिकार हुए बहनों की आहें प्रधान सेवक, गृह मंत्री और चीफ़ जस्टिस तक नहीं पहुंची?

दोषियों की सुनवाई के लिए स्पेशल अदालत क्यों नहीं लगाई जा रही है?

बुलंदशहर घटना पर चिल्लाने वाले, इंसानों को क्या यह घटना इंसानियत को शर्मसार और दाग़दार करने वाला नहीं लगता?

या मेवात के इन निर्भया के लिए इस लिए आवाज़ नहीं उठाई जा रही है, क्योंकि वे मुस्लिम हैं।

दलितों, पिछड़ों, मुस्लिमों की बेटियां भारत की बेटियां नहीं हैं, सिर्फ ब्राहाणों की बेटियां ही भारत की बेटियां हैं?

निर्भया ब्राह्मणों की बेटी थी, बुलंदशहर गेंगरेप जो हुआ था वह भी ब्राह्मणों की बेटी थी, तो क्या ये समझ लिया जाये कि जब ब्राह्मणों की बहन बेटियों की इज्जत लूटी जाती है तो सरकार, नेता, मीडिया, और समाजसेवियों को दर्द होता है?

पर जब यही सब कुछ मुसलमानों व दलितों के साथ होता है तो यह लोग ऐसे खामोश बैठ जाते हैं जैसे मानों उनकी खुद की सहमति रही हो उसमें, ये विचारधारा क्यों?

कब से?

अगर नहीं तो अभी तक मेवात की निर्भयाओं को इंसाफ़ क्यों नहीं मिला, इस सवाल का जवाब चाहिए और बस इंसाफ चाहिए इस देश की हर बेटी को।

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