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Thursday, 1 September 2016

जब सरकार में नहीं रहते तब माया-मुलायम को याद आते हैं जेलों में बंद बेगुनाह मुस्लिम





लखनऊ। रिहाई मंच ने आजमगढ़ में बसपा प्रमुख मायावती द्वारा आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिमों की गिरफ्तारी पर दिए बयान पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि मायावती के मुख्यमंत्री काल में जब तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल आजमगढ़, प्रतापगढ़, बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली से बेगुनाहों को उठाने का अभियान चला रहे थे, मायावती की एसपीजी सुरक्षा के लिए माहौल बनाने के लिए शाल बेचने वाले कश्मीरी युवकों को राजधानी लखनऊ में फर्जी मुठभेड़ों में गोलियों से भूना जा रहा था तब मायावती को ये बात क्यों नहीं समझ आई थी।

मायावती को यह भी बताना चाहिए कि कानपुर में बम बनाते हुए मारे गए संघी आतंकवादियों के मामले में उनकी सरकार ने क्यों जांच आगे नहीं बढ़ाई।

रिहाई मंच ने कहा है कि जब मायावती अपनी किताब ‘मेरे बहुजन संघर्ष का सफरनामा’ में लिखती हैं कि योगी आदित्यनाथ की गतिविधियां देश विरोधी हैं, तब उनके देश विरोधी गतिविधियों के खिलाफ उन्होंने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? या अजय मोहन सिंह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जब कोर्ट के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज हुई तो उनकी सरकार ने क्यों विरोध किया या फिर सुप्रीम कोर्ट में उनकी सरकार आदित्यनाथ के पक्ष में क्यों खड़ी हुई?  

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि मायावती जी को कब इस ज्ञान की प्राप्ति हुई कि आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को पुलिस फंसाती हैं उन्हें बताना चाहिए। क्या उन्हें इसका ज्ञान चुनाव के कारण हुआ है। 2002 गुजरात के मुस्लिम जनसंहार के बाद मोदी के प्रचार में जा चुकी मायावती से उन्होंने पूछा कि बाटला हाउस 2008 को वह क्या मानती हैं? उन्होंने कहा कि आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की गिरफ्तारियों के खिलाफ खड़े हुए आंदोलनों के दबाव में पक्ष-विपक्ष की सत्ताधारी पार्टियां वोटों के खातिर इस सवाल को उठाती हैं पर जब वे सत्ता में रहती हैं तो वह न खुद संघ द्वारा पोषित सुरक्षा-खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर बेगुनाहों को जेलों में ठूंसने का काम करती हैं बल्कि उनकों सालों साल कैस जेल में सड़ा कर पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम किया जाए इसके लिए निचली अदालतों से बरी युवकों के खिलाफ ऊपरी अदालतों में अपील भी करती हैं। कानपुर के बरी युवकों के खिलाफ जहां मायावती सरकार ऊपरी अदालत में गई तो वहीं बिजनौर, पंश्चिम बंगाल के युवकों के खिलाफ अखिलेश सरकार गई है।

रिहाई मंच आजमगढ़ प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि 2007 में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की गिरफ्तारियों के खिलाफ मायावती सरकार में ही आंदोलन की शुरुआत की गई थी। जब रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की लड़ाई लड़ने का फैसला किया तो इन्हीं मायावती जी की सरकार में लखनऊ, फैजाबाद, बराबंकी की अदालतों में उन्हें और उनके सहयोगी वकीलों व मुअक्लिों को बेरहमी से पीटा गया और राज्यद्रोह तक के मुकदमें दर्ज किए गए। जिसके प्रमुख मुद्दे आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए युवकों की गिरफ्तारियों पर जांच आयोग का गठन करना, बेगुनाहों की रिहाई के लिए चुनावी घोषणापत्रों में वादा करना  और आईबी को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए संसद में सवाल उठाना था। आंदोलनों के दबाव में मायावती ने 2008 में तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर आरडी निमेष कमीशन का गठन तो कर दिया जिसकी रिपोर्ट 6 महीने में आनी थी पर 6 महीने तक उस आयोग को बैठने तक के लिए स्थान नहीं दिया। बहुत दबाव में जब आयोग को स्थान मिला भी तो कमीशन द्वारा रिपोर्ट तैयार किए जाने की प्रक्रिया को जानबूझ कर फंड और स्टाफ जैसे तकनीकी कारणों से टाला गया क्योंकि मायावती उसे अपने कार्यकाल में लेना ही नहीं चाहती थीं। ताकि उन्हें अपने ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करना पड़े। प्रेस विज्ञप्ति में मसीहुद्दीन संजरी ने आरोप लगाया है कि अखिलेश सरकार ने भी यही रवैया रखा लेकिन जनदबाव में जब अखिलेश सरकार को अगस्त 2013 में कमीशन की रिपोर्ट लेनी पड़ी तब उन्होंने ने भी इसे हाशिमपुरा, मुरादाबाद और कानपुर के मुस्लिम विरीधी हिंसा पर आई जंाच कमीशन की रिपोर्टाे की तरह ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश ही नहीं की बल्कि रिपोर्ट में बेगुनाह बताए गए खालिद मुजाहिद की हिरासत में हत्या भी करवा दी। लेकिन रिहाई मंच के 121 दिन लम्बे धरने के दबाव में मुख्य

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